क जानी-पहचानी सड़क पर हम फिर से निकल पड़े थे.
असम के दक्षिणी शहर सिलचर से क़रीब दो घंटे दूर आमराघाट गाँव का सफ़र इस बार कब ख़त्म हुआ पता ही नहीं चला.
इस बार गाँव में घुसते वक़्त दुकानदारों से लेकर सब्ज़ी वालों के चेहरे हमें देखकर मुस्कुरा उठे.
गाड़ी
उसी घर के सामने रुकी, जिसमें से पिछली बार एक पत्नी और माँ का सिसकना ही
सुनाई पड़ता था, जिसके पड़ोसियों की नज़रें हर मेहमान को बारीक़ी से परखती
थीं.
आँगन में छोटे मंदिर के सामने इस बार भी अगरबत्ती जल रही थी और
साथ में एक बड़ा सा दीया भी लेकिन इस बार प्रार्थना में शुक्रिया का भाव
ज़्यादा और दर्द की टीस कम थी. 9 जुलाई, 2018 को इसी मंदिर में आँसुओं से भरी एक पत्नी प्रार्थना करके
पति से मिलने सिलचर सेन्ट्रल जेल गईं थीं. वापसी ख़ाली हाथ हुई थी.
उनके पति की भारतीय नागरिकता पर सवाल उठा था और मामले की सुनवाई कर रही विशेष अदालत (विदेशी ट्राइब्यूनल) ने नोटिस भेज दिया था.
अदालत में हाज़िर न होने के चलते उन्हें सिलचर के डिटेंशेन कैंप में क़ैदी बन दिया गया था.
असम राज्य में पिछले तीन दशकों से विदेशी नागरिकों या 'घुसपैठियों' की पहचान करने की मुहिम जारी है.
इस बार बात कुछ और है. भीतर कमरे में अजित दास की गोद में दो बच्चे बैठे
बिस्कुट खा रहे थे और बगल में जुतिका दास दोपहर का खाना पका रहीं थी.
एकाएक उठ खड़े हुए अजित दास ने हाथ जोड़ कहा, "बीबीसी को कभी नहीं भूलूंगा, सर. बीबीसी नहीं आया होता तो मैं वहीँ होता."
जुलाई महीने में ही अजित से हमारी मुलाक़ात सिलचर सेंट्रल जेल में हुई थी.
पिछले ढाई महीने से वे जेल के भीतर बने डिटेंशन कैंप में क़ैद थे और हम उनके परिवार के साथ उनसे मिलने गए थे.
अजित का नाम असम के डी-वोटर यानी संदिग्ध वोटर की श्रेणी में है.
1985 से अब तक राज्य में कम से कम 85,000 लोगों के ख़िलाफ़ विदेशी नागरिक होने की शिक़ायत दर्ज की गई हैं.न मामलों की सुनवाई कर रही एक विशेष अदालत (विदेशी ट्राइब्यूनल) ने अजित के नाम का वारंट जारी किया था.
अजित के क़ैद में रहने पर पत्नी जुतिका दास यहाँ से दो घंटे दूर आमराघाट गांव में बच्चों को भी देखती थीं.
किसी तरह परिवार की राशन की दुकान को भी चला रहीं थी जिससे ख़र्चे पूरे हो सकें और वकीलों की फ़ीस का इंतज़ाम भी.
बीबीसी
हिंदी की रिपोर्ट के बाद दक्षिण असम के कछार प्रांत में अजित दास पहले ऐसे
व्यक्ति थे, जिन्हें डिटेंशन कैंप से ज़मानत पर रिहा किया गया.
गांव
लौट आए अजित ने कहा, "ज़मानत के बाद जेल से घर तक पहुँचते हुए रात हो चली
थी. बच्चे सो चुके थे लेकिन एकाएक मेरी आवाज़ सुन कर जग गए और लिपट कर रोने
लगे. उसके बाद से वे मुझे छोड़ते ही नहीं हैं."
अजित की बड़ी बेटी
चार साल की है और ऑटिज्म की वजह से उसका जीवन मुश्किल है. ज़मानती आदेश में
इस बात का ज़िक्र है कि अब अजित अपने बेटी का रुका हुआ इलाज शुरू करा सकते
है.
अजित ने आगे बताया, "जब पुलिस मुझे पकड़ कर ले गई थी तब बेटी
ने देख लिया था. आज वो किसी भी वर्दी वाले को देख कर घबरा जाती है और
ज़ोर-ज़ोर से रोने लगती है".
अजित की मुश्किलों के बीच जिस इंसान ने ज़बरदस्त हिम्मत दिखाई है, यकीनन वे उनकी पत्नी जुतिका हैं.
हालांकि
दिक्कतें अभी भी हैं. पति की कानूनी लड़ाई के अलावा नई मुसीबत ये है कि
उनके दोनों बच्चों की भारतीय नागरिकता भी ख़तरे में है.
जुतिका ने
बताया, "बेटी का इलाज दोबारा शुरू हो गया है. अगली चुनौती कर्ज़ चुकाने की
है जो क़ानूनी प्रक्रिया के लिए लिया था. पति अब दुकान पर बैठने लगे हैं
लेकिन हर एक दो दिन पर कोई बुरा सपना देख लेती हूँ. कब ख़त्म होगा ये सब,
पता नहीं. डर इस बात का भी है कि कहीं आगे चल कर पति-बच्चे देश से खदेड़ न
दिए जाएं".
जुतिका के माता-पिता और उनके भाई ने भी इस दौर में उन्हें उधार दिया था जिसे अब वो वापस करना चाहती हैं.
उन्होंने कहा, "बीबीसी हिंदी पर इस ख़बर को देख कर कोलकाता से मेरे पास तीन संस्थाओं की मदद को पेशकश आ चुकी है."0 जुलाई, 2018 को नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का फ़ाइनल ड्राफ़्ट जारी हुआ है.
असम के 40 लाख लोगों के नाम इस लिस्ट में शामिल नहीं हैं, इनमें हिंदू-मुसलमान, बंगाली-बिहारी सभी हैं.
अजित दास के मामले की वजह है उनके माता-पिता का 1960 के दशक में बांग्लादेश से भारत आकर बस जाना.
वैसे,
उनकी तरह आए तमाम लोगों के पास अगर नागरिकता के प्रमाण हैं तो उनका नाम
एनआरसी में या तो आ चुका है या आगे लिस्ट में आने की संभावना है.
हालांकि
अजित दास का कहना है कि उनका जन्म वगैरह भारत में हुआ है और सभी प्रमाण
मौजूद हैं, लेकिन पिछली बार सभी दस्तावेज़ नामंज़ूर भी कर दिए गए थे.
ज़ाहिर है, जिन लाखों लोगों के नाम एनआरसी में नहीं आए हैं उनके भीतर इस बात को लेकर डर ज़रूर है कि आगे क्या होगा.
सरकार ने इस बात का भरोसा दिलाया है कि किसी के ख़िलाफ़ फ़िलहाल कोई क़दम नहीं उठाया जाएगा.
सभी को सितंबर के अंत तक दोबारा दस्तावेज़ जमा करने का मौक़ा भी दिया गया है.
जिन
दस्तावेज़ों को जमा करना है, उनमें से किसी एक से ये प्रमाणित होना ज़रूरी
है कि जमा करने वाले या उनके पूर्वजों का नाम 1951 के एनआरसी में या 24
मार्च 1971 तक के किसी वोटर लिस्ट में मौजूद था.
इस बीच असम के इस छोटे से गांव में जुतिका और अजित दास के बच्चे इन दिनों इस बात से ही खुश हैं कि पापा घर वापस लौट आए हैं.
जुतिका
के मुताबिक़, "महीनों पिता को न देखने की वजह से बच्चे अब उन्हें घर से
सटी हुई दुकान तक में नहीं जाने देते. ये सोच के मन डर भी जाता है कि लाखों
ऐसे परिवार असम में मौजूद हैं जिनके ऊपर इस तरह की तलवार लटक रही है. बस
एक ही ख़ुशी है कि पति ज़मानत पर क़ैद से छूट गए."
ये ख़ुशी कब तक की है, इसका पता किसी को नहीं.
Thursday, August 30, 2018
Sunday, August 26, 2018
中国恐难在2017年前推行全国性碳交易计划
中国旨在“2017年初”将40亿吨碳排放纳入全国性碳市场机制下,并建立全球规模最大的温室气体排放交易市场。中国打算自计划之初就将所有省份都纳入进来。
我们认为,中国国内立法进程和私营部门技术能力将限制这项宏伟的计划。
要保证全国性碳市场的正常运转,必须先解决一些主要的问题。
我们预计,中国的碳排放监管当局将无法实现原计划,一个覆盖全部省份的全国性碳交易市场在未来2年将无法建成。
此时此刻,我们有必要提出这样一个问题:中国碳交易计划的实施究竟有何重要意义?
首先,只有降低煤炭消费,中国的碳排放量才会降低,这已经成为老生常谈。同时,减少煤炭消费也与中国治理空气污染的努力有着密切的关联。
另外,在巴黎气候协议签署之后,全国性碳交易市场的推出也可以提升中国气候变化政策执行的透明度,在2018年全球各国“盘点”碳排放量之前,这一点无疑将受到国际社会的密切关注。
第三,如果我们观察中国过去三十年的经济发展历程,不难发现中国最富竞争力、发展最快的行业是那些主要由市场力量和竞争驱动的行业,而非国家管控的行业。
中国建立全国性碳交易市场的计划在巴黎联合国气候会谈期间得到了更加密切的关注,从中国代表团方面传出的最重要的消息就是中国主管气候变化事务的官员表示中国的全国性碳交易市场将于2017年初正式启动。
具体而言,这一市场将覆盖中国所有省份以及来自6个行业、15个子行业的近万家企业。
巴黎峰会期间,另外一位中国官员也表示,碳交易市场机制的设计必须‘严谨’,否则将无益于中国实现减排。
但我们要问,中国到2017年推出一个覆盖万家企业、设计严谨的碳交易市场的可能性有多大?
政策支持是否足够?
从全球范围来看,中国政府对碳交易市场的支持只有欧盟与之媲美。
中国首个碳交易市场试点项目于2013年6月在深圳启动,全国性碳交易市场的前景自此吸引了媒体关注。
若要在2017年初正式推出全国性碳交易计划,中国现在只有不到18个月的时间来准备市场所需的全部要件。
各有关监管机构都毫无疑问地支持全国碳交易项目的建设,尤其是国家主席习近平去年九月对此表示支持之后,各部门愈发全力支持。但要完成这项宏伟计划所必须具备的立法条件,还有大量的工作需要完成。
首先,中国任何新政策都需要相应的官方立法才能生效。早于2015年9月习近平主席访美,坊间已经传出立法草案的一些消息,但这些传闻太过抽象,缺乏关于碳市场的具体内容。
总体来说,碳交易立法流程甚至连一个初步的时间表都没有,对于局外人来说更是无法看透。
从理论上说,碳交易市场所采用法律的具体形式决定着其法律效力,并且无法保证碳交易最终立法与草案形式相同。
碳交易监管立法草案对于碳交易市场运作的方式及启动时间语焉不详。
不过,有两个确定的要点值得注意。
首先,碳交易相关立法估计会旷日持久,因为这一过程牵涉各类监管机构,可能由国家发展改革委员会( )牵头,从财政部到证监会的一众监管机构都会参与。
另外,相关政府机构中任何不确定性或者结构性的变化都可能拖延立法进程。
不过从乐观的角度估计,中国官方有可能快速完成立法,克服这个有可能阻碍2017年之前全国性碳市场落地的最大政治障碍。
尽管如此,立法绝非当局面临的唯一政治挑战。发改委负责气候变化事务的一位高级官员曾表示,全国碳交易计划的排放总量将比中国2020年和2030年总排放强度降低幅度更为严格。
这听起来很合理,并且与欧盟碳排放交易体系的做法相近——被后者纳入体系中的相关行业(发电、重工业)都面临着比碳市场之外的行业(例如交通和农业)更高的减排目标。但是为了落实这个体系,监管机构既要设定市场总体尺度,又要在市场涵盖的15个行业之间分配配额,同时完成这两项工作事实上十分复杂。
自从2014年以来,发改委已经要求10个行业的企业开始提交排放数据。但这一政策的实际执行情况以及向中央政府汇报的数据汇编都并不在公众监督之内。
欧盟碳排放交易体系等其他成熟碳市场的经验已经证明,没有充足的历史排放数据,市场容易发生配额过度的情况。总体来说,对于任何碳排放交易计划都至关重要的排放权分配过程变数很多。
因此,虽然高层的政治支持不会动摇,对于如何设计一个高水平的市场,仍然存在很多问题。
市场扭曲?
众所周知,中国政府的政策在发布之后往往会受到外力的影响。作为一个受到政策驱动的市场,碳排放交易市场尤其容易受到外部因素干扰。
天津的碳抵消交易买家就曾在去年五月吞下苦果:当时地方监管机构突然发布通知称,要在合规截止日期两个月之前检查地方试点项目中碳排放抵消是否合格。
据猜测,一些企业在通知发布之前曾购买不合格的抵消碳排放。不过在合规截止日期之后,地方监管机构也没就有关碳排放抵消的合规性发布后续官方声明。
可想而知,对于市场参与者来说,全国碳排放交易所将比目前各自为战的地方试点项目体现出更多的政治确定性。
在全国性碳排放交易落地之前,没人能够确保在项目启动之前的准备工作中不会重演类似的闹剧。这种不确定性会严重损害市场信心,并影响投资者对碳排放市场的兴趣。
投资者从试点项目中学到的另一教训是,对官方口径总要保留一丝怀疑的态度,即便是白纸黑字也不能全信。
现有试点项目中的拍卖机制便能充分说明这一点。虽然多地的试点项目都提到会将拍卖作为一种配额分配的补充来源,只有广东在第二个合规年度举行了拍卖;而即便是在广东,由于市场反响冷淡,拍卖的排放量也较之前公告的有所缩水。
此类潜在风险根植于中国政治的整体环境,因此我们认为全国碳排放交易项目在这一方面与此前的试点项目无异。
我们预计,中央政府会发布有关公告,阐明抵消项目的环境正当性,并澄清全国性计划中的重复计算和森林碳交易额度等问题。
毫无疑问,进一步的决策还会将可再生能源产业、林业等相关利益团体纳入考量。
至于眼下,值得一提的是现存一些——如果不是很多——抵消项目还未问世就已经面临“搁浅”的风险。从广义上说,它们由于潜在的供给过剩以及迟早会到来的市场监管几乎失去了全部价值。
我们认为,中国国内立法进程和私营部门技术能力将限制这项宏伟的计划。
要保证全国性碳市场的正常运转,必须先解决一些主要的问题。
我们预计,中国的碳排放监管当局将无法实现原计划,一个覆盖全部省份的全国性碳交易市场在未来2年将无法建成。
此时此刻,我们有必要提出这样一个问题:中国碳交易计划的实施究竟有何重要意义?
首先,只有降低煤炭消费,中国的碳排放量才会降低,这已经成为老生常谈。同时,减少煤炭消费也与中国治理空气污染的努力有着密切的关联。
另外,在巴黎气候协议签署之后,全国性碳交易市场的推出也可以提升中国气候变化政策执行的透明度,在2018年全球各国“盘点”碳排放量之前,这一点无疑将受到国际社会的密切关注。
第三,如果我们观察中国过去三十年的经济发展历程,不难发现中国最富竞争力、发展最快的行业是那些主要由市场力量和竞争驱动的行业,而非国家管控的行业。
中国建立全国性碳交易市场的计划在巴黎联合国气候会谈期间得到了更加密切的关注,从中国代表团方面传出的最重要的消息就是中国主管气候变化事务的官员表示中国的全国性碳交易市场将于2017年初正式启动。
具体而言,这一市场将覆盖中国所有省份以及来自6个行业、15个子行业的近万家企业。
巴黎峰会期间,另外一位中国官员也表示,碳交易市场机制的设计必须‘严谨’,否则将无益于中国实现减排。
但我们要问,中国到2017年推出一个覆盖万家企业、设计严谨的碳交易市场的可能性有多大?
政策支持是否足够?
从全球范围来看,中国政府对碳交易市场的支持只有欧盟与之媲美。
中国首个碳交易市场试点项目于2013年6月在深圳启动,全国性碳交易市场的前景自此吸引了媒体关注。
若要在2017年初正式推出全国性碳交易计划,中国现在只有不到18个月的时间来准备市场所需的全部要件。
各有关监管机构都毫无疑问地支持全国碳交易项目的建设,尤其是国家主席习近平去年九月对此表示支持之后,各部门愈发全力支持。但要完成这项宏伟计划所必须具备的立法条件,还有大量的工作需要完成。
首先,中国任何新政策都需要相应的官方立法才能生效。早于2015年9月习近平主席访美,坊间已经传出立法草案的一些消息,但这些传闻太过抽象,缺乏关于碳市场的具体内容。
总体来说,碳交易立法流程甚至连一个初步的时间表都没有,对于局外人来说更是无法看透。
从理论上说,碳交易市场所采用法律的具体形式决定着其法律效力,并且无法保证碳交易最终立法与草案形式相同。
碳交易监管立法草案对于碳交易市场运作的方式及启动时间语焉不详。
不过,有两个确定的要点值得注意。
首先,碳交易相关立法估计会旷日持久,因为这一过程牵涉各类监管机构,可能由国家发展改革委员会( )牵头,从财政部到证监会的一众监管机构都会参与。
另外,相关政府机构中任何不确定性或者结构性的变化都可能拖延立法进程。
不过从乐观的角度估计,中国官方有可能快速完成立法,克服这个有可能阻碍2017年之前全国性碳市场落地的最大政治障碍。
尽管如此,立法绝非当局面临的唯一政治挑战。发改委负责气候变化事务的一位高级官员曾表示,全国碳交易计划的排放总量将比中国2020年和2030年总排放强度降低幅度更为严格。
这听起来很合理,并且与欧盟碳排放交易体系的做法相近——被后者纳入体系中的相关行业(发电、重工业)都面临着比碳市场之外的行业(例如交通和农业)更高的减排目标。但是为了落实这个体系,监管机构既要设定市场总体尺度,又要在市场涵盖的15个行业之间分配配额,同时完成这两项工作事实上十分复杂。
自从2014年以来,发改委已经要求10个行业的企业开始提交排放数据。但这一政策的实际执行情况以及向中央政府汇报的数据汇编都并不在公众监督之内。
欧盟碳排放交易体系等其他成熟碳市场的经验已经证明,没有充足的历史排放数据,市场容易发生配额过度的情况。总体来说,对于任何碳排放交易计划都至关重要的排放权分配过程变数很多。
因此,虽然高层的政治支持不会动摇,对于如何设计一个高水平的市场,仍然存在很多问题。
市场扭曲?
众所周知,中国政府的政策在发布之后往往会受到外力的影响。作为一个受到政策驱动的市场,碳排放交易市场尤其容易受到外部因素干扰。
天津的碳抵消交易买家就曾在去年五月吞下苦果:当时地方监管机构突然发布通知称,要在合规截止日期两个月之前检查地方试点项目中碳排放抵消是否合格。
据猜测,一些企业在通知发布之前曾购买不合格的抵消碳排放。不过在合规截止日期之后,地方监管机构也没就有关碳排放抵消的合规性发布后续官方声明。
可想而知,对于市场参与者来说,全国碳排放交易所将比目前各自为战的地方试点项目体现出更多的政治确定性。
在全国性碳排放交易落地之前,没人能够确保在项目启动之前的准备工作中不会重演类似的闹剧。这种不确定性会严重损害市场信心,并影响投资者对碳排放市场的兴趣。
投资者从试点项目中学到的另一教训是,对官方口径总要保留一丝怀疑的态度,即便是白纸黑字也不能全信。
现有试点项目中的拍卖机制便能充分说明这一点。虽然多地的试点项目都提到会将拍卖作为一种配额分配的补充来源,只有广东在第二个合规年度举行了拍卖;而即便是在广东,由于市场反响冷淡,拍卖的排放量也较之前公告的有所缩水。
此类潜在风险根植于中国政治的整体环境,因此我们认为全国碳排放交易项目在这一方面与此前的试点项目无异。
我们预计,中央政府会发布有关公告,阐明抵消项目的环境正当性,并澄清全国性计划中的重复计算和森林碳交易额度等问题。
毫无疑问,进一步的决策还会将可再生能源产业、林业等相关利益团体纳入考量。
至于眼下,值得一提的是现存一些——如果不是很多——抵消项目还未问世就已经面临“搁浅”的风险。从广义上说,它们由于潜在的供给过剩以及迟早会到来的市场监管几乎失去了全部价值。
Friday, August 17, 2018
老挝溃坝悲剧拷问湄公河水电大跃进
7月23日,热带风暴来袭导致洪水爆发,老挝南部阿速坡省一座韩国建设的大坝因此发生溃坝。本次事故共造成8个村庄受灾,数百人失踪,超过6000人流离失所。
本次发生溃堤的是韩国建设的41万千瓦桑片-桑南内水电站项目西侧的副坝,水库蓄水奔流而出,淹没了位于下游1000米处的多个村庄。这个水库位于村庄上游的波多芬高原,巨大的落差加剧了洪水的危害。这一次洪水来袭的速度非常快,而受灾地区此前很少发生洪灾。
洪泛区域临近老柬边境地区。洪水从桑片河流入两国交界处的湄公河重要支流西公河,随后淹没了柬埔寨上丁省的几个偏远村庄。很显然,这些柬埔寨村庄并没有收到洪水即将来袭的通知。
这次溃坝悲剧造成的巨大伤亡和经济损失乃至国际影响都令老挝政界不安。八月七日,老挝政府下令叫停所有新水电项目的审批,并重新评估其发展战略。该国总理还设立了一个特别工作小组,负责对所有在建和建成的大坝进行工程质量审查。考虑到老挝的能源和矿产部号称要在2020年前建起百座水电站,如果要逐一对每座大坝做细致的监察,这一过程可能将长达超多一年。
发生事故的地区属于湄公河支流系统,而老挝和柬埔寨之间并没有建立任何洪水预警或灾害共管系统。作为负责这一流域管理的政府间机构,湄公河委员会的信息系统只对湄公河干流上的大坝进行监测。显然,这一区域还需进行更多的跨界合作。
老挝致力于将自己打造成东南亚地区的“电池”,向邻国大量出口电力资源。而这座坍塌的大坝只是老挝境内湄公河流域140座大坝中的一个。这些在建的大坝基本上都是由中国、泰国等外国企业建造的。
这次灾害说明,在监管措施和安全标准薄弱,极端天气相对更加频繁的地区,修建大坝面临的风险也就更大。
是天灾,更是人祸
毫无疑问,桑片-桑南内大坝溃坝是一场人为的灾难。其实,对于这座尚未完工的副坝在季风季节极端天气下面临的风险,隶属韩方的PNPC公司是知情的。此外,这家公司也应该知道热带风暴山神正迅速由东逼近越南沿海地区。天气预报预测也在事故发生前预报了飓风登陆的具体时长。湄公河这一流域(老挝南部和越南中部高地)是每年季风季节降水最集中的地区。其实,韩方大坝管理人员此前已经发现这座大坝所在地区的降雨量达到了正常雨量的3倍。
尽管如此,该公司仍然没有及时采取季风季节常用的降低水库水位的方法来避免大坝溃坝。大坝所属公司在溃坝前24小时发现大坝顶端出现了一个塌陷点,但是并未采取任何措施。
这家韩国公司的确在7月23日向老挝政府发出了大坝溃坝预警,但是这时距离事故发生仅剩下几个小时。这种情况下,当地政府根本没有时间向下游村庄发出预警并采取其他应对措施。事故新闻一经报道,该大坝项目的两家韩国投资公司股价分别应声下跌6%和10%。
风险越来越大
目前,老挝的140座大坝中有三分之一已经完工,还有三分之一在建设之中。这些大坝基本都是由来自中国、泰国、韩国等国的外国开发商分别建设的,因为老挝政府和社会并不具备独立建设这类工程的资源。这些大坝的承建公司拥有20到30年不等的商业经营权,并在特许经营期结束之后将大坝移交给老挝政府。换句话说,在大坝特许经营期结束前老挝是无法从电力出口中获益的,但在灾难发生时老挝政府却负有救灾责任。
该国希望通过对外输出水电来摘掉“最不发达国家”(Least Developed Country,简称LDC)的帽子,而大坝建设狂潮是这一计划的一部分。这一计划能否实现目前仍存在很大变数。2018年6月,老挝总理通伦·西苏里()承认,老挝无法在2020年完成在20年内成为中等收入国家的目标。
包括湄公河委员会近来发布的《理事会研究》和史汀生中心(Stimson Center)发布的多项经过同行评审的研究都警告称,老挝的大坝计划会给下游民众和国家带来巨大风险。比如,被大坝拦截的沉积物会严重威胁越南湄公河三角洲地区的地质完整性和丰沛的农业产出。此外,这些大坝还会阻碍湄公河流域的鱼类洄游,而柬埔寨每年的渔获是该国居民饮食重要的蛋白质来源。
也有不少人对老挝在发展规划和救灾准备方面的不足提出了批评。比如,老挝欠缺天气预报和信息传播方面的能力,多数大坝所在地周边省份的能力更是薄弱。正因为这些地区这方面的治理水平低下,阿速坡省灾害响应速度才会比较慢。被洪水淹没的地区距离最近的公路还有40多公里。进入灾区的唯一通道就是一些泥泞小道,救灾车辆很难行进,在季风季节难度就更大。史汀生中心的布莱恩·埃勒和考特尼·韦瑟比曾在几年前访问过其中一个受灾镇,到那里要从阿速坡镇中心乘坐一辆四驱皮卡跋涉30公里,全程耗时2个多小时。
此外,这次灾害给当地民众带来的风险也让人们怀疑,这些大坝真的能造福当地民众吗?早在溃坝事故之前,桑片-桑南内水电站项目已经让当地居民丧失了自己的土地和生计。这些因为大坝项目而动迁的村民为了生活,不得不在附近的咖啡种植园打工养家。
一方有难,八方支援
目前,美国驻万象大使馆正在积极为老挝政府提供帮助,并同时为国际援助工作提供支持。据媒体报道,中国和泰国正在带头组织救灾工作。此外,澳大利亚也派出了2架载有救援物资的飞机,希望提供进一步支持。
这次事故也对老挝“东南亚电池”计划造成了又一次打击。2018年3月,泰国暂停了从拟建于湄公河干流的北本大坝购买电力的计划。泰国和越南是老挝多年来主要的电力出口市场,而近年来太阳能、风能、沼气等替代能源逐步抢占和取代了老挝的水电资源市场份额。而中国西南地区也出现了电力产能过剩的局面,并且也试图向东南亚市场输出电力。这可能会让老挝水电在近期和中期变得毫无竞争力。
本次发生溃堤的是韩国建设的41万千瓦桑片-桑南内水电站项目西侧的副坝,水库蓄水奔流而出,淹没了位于下游1000米处的多个村庄。这个水库位于村庄上游的波多芬高原,巨大的落差加剧了洪水的危害。这一次洪水来袭的速度非常快,而受灾地区此前很少发生洪灾。
洪泛区域临近老柬边境地区。洪水从桑片河流入两国交界处的湄公河重要支流西公河,随后淹没了柬埔寨上丁省的几个偏远村庄。很显然,这些柬埔寨村庄并没有收到洪水即将来袭的通知。
这次溃坝悲剧造成的巨大伤亡和经济损失乃至国际影响都令老挝政界不安。八月七日,老挝政府下令叫停所有新水电项目的审批,并重新评估其发展战略。该国总理还设立了一个特别工作小组,负责对所有在建和建成的大坝进行工程质量审查。考虑到老挝的能源和矿产部号称要在2020年前建起百座水电站,如果要逐一对每座大坝做细致的监察,这一过程可能将长达超多一年。
发生事故的地区属于湄公河支流系统,而老挝和柬埔寨之间并没有建立任何洪水预警或灾害共管系统。作为负责这一流域管理的政府间机构,湄公河委员会的信息系统只对湄公河干流上的大坝进行监测。显然,这一区域还需进行更多的跨界合作。
老挝致力于将自己打造成东南亚地区的“电池”,向邻国大量出口电力资源。而这座坍塌的大坝只是老挝境内湄公河流域140座大坝中的一个。这些在建的大坝基本上都是由中国、泰国等外国企业建造的。
这次灾害说明,在监管措施和安全标准薄弱,极端天气相对更加频繁的地区,修建大坝面临的风险也就更大。
是天灾,更是人祸
毫无疑问,桑片-桑南内大坝溃坝是一场人为的灾难。其实,对于这座尚未完工的副坝在季风季节极端天气下面临的风险,隶属韩方的PNPC公司是知情的。此外,这家公司也应该知道热带风暴山神正迅速由东逼近越南沿海地区。天气预报预测也在事故发生前预报了飓风登陆的具体时长。湄公河这一流域(老挝南部和越南中部高地)是每年季风季节降水最集中的地区。其实,韩方大坝管理人员此前已经发现这座大坝所在地区的降雨量达到了正常雨量的3倍。
尽管如此,该公司仍然没有及时采取季风季节常用的降低水库水位的方法来避免大坝溃坝。大坝所属公司在溃坝前24小时发现大坝顶端出现了一个塌陷点,但是并未采取任何措施。
这家韩国公司的确在7月23日向老挝政府发出了大坝溃坝预警,但是这时距离事故发生仅剩下几个小时。这种情况下,当地政府根本没有时间向下游村庄发出预警并采取其他应对措施。事故新闻一经报道,该大坝项目的两家韩国投资公司股价分别应声下跌6%和10%。
风险越来越大
目前,老挝的140座大坝中有三分之一已经完工,还有三分之一在建设之中。这些大坝基本都是由来自中国、泰国、韩国等国的外国开发商分别建设的,因为老挝政府和社会并不具备独立建设这类工程的资源。这些大坝的承建公司拥有20到30年不等的商业经营权,并在特许经营期结束之后将大坝移交给老挝政府。换句话说,在大坝特许经营期结束前老挝是无法从电力出口中获益的,但在灾难发生时老挝政府却负有救灾责任。
该国希望通过对外输出水电来摘掉“最不发达国家”(Least Developed Country,简称LDC)的帽子,而大坝建设狂潮是这一计划的一部分。这一计划能否实现目前仍存在很大变数。2018年6月,老挝总理通伦·西苏里()承认,老挝无法在2020年完成在20年内成为中等收入国家的目标。
包括湄公河委员会近来发布的《理事会研究》和史汀生中心(Stimson Center)发布的多项经过同行评审的研究都警告称,老挝的大坝计划会给下游民众和国家带来巨大风险。比如,被大坝拦截的沉积物会严重威胁越南湄公河三角洲地区的地质完整性和丰沛的农业产出。此外,这些大坝还会阻碍湄公河流域的鱼类洄游,而柬埔寨每年的渔获是该国居民饮食重要的蛋白质来源。
也有不少人对老挝在发展规划和救灾准备方面的不足提出了批评。比如,老挝欠缺天气预报和信息传播方面的能力,多数大坝所在地周边省份的能力更是薄弱。正因为这些地区这方面的治理水平低下,阿速坡省灾害响应速度才会比较慢。被洪水淹没的地区距离最近的公路还有40多公里。进入灾区的唯一通道就是一些泥泞小道,救灾车辆很难行进,在季风季节难度就更大。史汀生中心的布莱恩·埃勒和考特尼·韦瑟比曾在几年前访问过其中一个受灾镇,到那里要从阿速坡镇中心乘坐一辆四驱皮卡跋涉30公里,全程耗时2个多小时。
此外,这次灾害给当地民众带来的风险也让人们怀疑,这些大坝真的能造福当地民众吗?早在溃坝事故之前,桑片-桑南内水电站项目已经让当地居民丧失了自己的土地和生计。这些因为大坝项目而动迁的村民为了生活,不得不在附近的咖啡种植园打工养家。
一方有难,八方支援
目前,美国驻万象大使馆正在积极为老挝政府提供帮助,并同时为国际援助工作提供支持。据媒体报道,中国和泰国正在带头组织救灾工作。此外,澳大利亚也派出了2架载有救援物资的飞机,希望提供进一步支持。
这次事故也对老挝“东南亚电池”计划造成了又一次打击。2018年3月,泰国暂停了从拟建于湄公河干流的北本大坝购买电力的计划。泰国和越南是老挝多年来主要的电力出口市场,而近年来太阳能、风能、沼气等替代能源逐步抢占和取代了老挝的水电资源市场份额。而中国西南地区也出现了电力产能过剩的局面,并且也试图向东南亚市场输出电力。这可能会让老挝水电在近期和中期变得毫无竞争力。
Wednesday, August 15, 2018
#HerChoice: 'मैंने अपने पति को बिना बताए अपनी नसबंदी करवा ली'
ति से इससे पहले भी झूठ बोला था. पर तब उसका नफ़ा-नुक़सान समझती थी. इस बार लग रहा था कि अंधे कूंए में छलांग लगाने जा रही हूं.
तब मसला कुछ और था. मैंने अपने पति को अपनी तन्ख़्वाह असल से कम बताई थी ताकि कुछ पैसे जमा कर सकूं और उसे शराब में पैसे उड़ाने से रोक सकूं.
मालूम था कि पकड़ी गई तो कितनी मार पड़ेगी. आंख सूज जाएगी, आंतों में दर्द रहेगा, कमर पर कुछ निशान होंगे. पर सुकून था कि बैंक की फ़िक्स्ड डिपॉज़िट में जमा किए पैसे वो फिर भी नहीं निकाल पाएगा.
ऐसा मैडम ने समझाया था. वर्ना बैंक में खाता खोलना और पैसे जमा करना मेरे जैसी गांव में पली-बढ़ी लड़की के बस की बात कहां.
पर अब तो ज़िंदगी भी मौत सी लगने लगी थी. मैं थी 22 साल की पर 40 की लगने लगी थी.
बदन पतला ज़रूर था पर जवान नहीं. हड्डियों का ढांचा-सा रह गया था. आंखों के नीचे काले गड्ढे थे और चेहरे पर मासूमियत की जगह ऊबाई-सी थकान थी.
चलूं तो लगता था कि कमर भी हल्की-सी झुक गई है. और ये तो सिर्फ़ वो था जो सबको दिखाई देता था. जो कुछ अंदर बिखर गया था उसकी चीख तो सिर्फ़ मेरे कानों में ही गूंजती थी.
शुरुआत में तो मुझे कुछ ग़लत भी नहीं लगता था. 15 साल की उम्र में शादी हुई और ब्याह कर शहर आ गए. पति काम कर के घर आते तो खाने के बाद बिस्तर में मेरी ज़रूरत होती.
सिर्फ़ ज़रूरत. मैं बस एक शरीर थी जिसकी भावनाओं से उसका कोई सरोकार नहीं था.
आज भी जो करने जा रही थी उसके बारे में मैडम ने ही बताया था. पर दिल मुंह को आ रहा था. इस बार दांव पर मेरा शरीर था. और सुना था कि इस ऑपरेशन में मौत भी हो सकती है.
चौथी बार जब मैं पेट से थी तो 20 की हो गई थी. अधमरे से मेरे शरीर को जब मैडम (जिनके घर मैं काम करती थी) ने फिर फूलते देखा तो नाराज़ हो गईं.
पूछा, पैदा कर पाओगी? इतना ख़ून भी है शरीर में? मैंने कहा, हो जाएगा.
सोचा बड़े घर की ये औरत क्या समझेगी मेरी ज़िंदगी को. बेटा पैदा होने तक मुझे ये सब झेलना ही था.
बैंक में पैसे जमा करने की सलाह और मदद एक बात थी पर घर-परिवार की ये बारीक़ी नहीं समझा सकती थी उन्हें.
मन करता था कि सब चुपचाप हो जाए. किसी को पता ना चले कि मैं पेट से हूं, मेरा शरीर ना बदले, मेरी ज़िंदगी की कहानी भरे चौराहे पर ना ला दे.
मुझे यक़ीन था कि बेटा हो जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा. मारपीट, शराब, बिस्तर का वो मनहूस सिलसिला टूट जाएगा. और इस बार बेटा ही हुआ!
अब मेरी क्या ग़लती थी? अब तो मैंने बेटा भी पैदा कर दिया था. पर मेरे पति को शायद शैतान बनने की आदत पड़ गई थी.
मेरा शरीर बहुत टूट गया था. फिर से पेट से ना हो जाऊं, ये ख़ौफ़ हर व़क्त सताता रहता था.
'मैंने कुंवारी मां बनने का फ़ैसला क्यों किया?'
'हां, मैं ग़ैर-मर्दों के साथ चैट करती हूं, तो?'
एक दिन मेरी मैडम ने मेरा बेजान चेहरा देख मुझसे पूछा, एक चीज़ बदलनी हो तो क्या बदलोगी अपनी ज़िंदगी में. मैं हंस दी. अपनी चाहत के बारे में ना मैंने कभी सोचा था ना किसी ने कभी पूछा था.
पर बात हंसी में टाली नहीं. ख़ूब सोचा. एक हफ़्ते बाद मैडम से कहा कि मेरा जवाब तैयार है. वो तो तब तक भूल भी गई थीं शायद.
तब मैडम ने कहा, नसबंदी का ऑपरेशन करवा लो. ये तुम्हारे हाथ में है. तुम उसे रात में चाहे ना रोक पाओ, कम से कम गर्भवती होने से तो खुद को बचा लोगी.
मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता था. कई दिन बीत गए. मेरे बहुत से सवाल थे. जब मैडम जवाब देते-देते थक गईं तो एक क्लीनिक का पता दिया.
वहां मेरे जैसी और औरतें थीं. उन्हीं से पता चला कि नसबंदी का ऑपरेशन जल्दी से हो तो जाता है पर कुछ गड़बड़ हो जाए तो जान भी जा सकती है.
तब मसला कुछ और था. मैंने अपने पति को अपनी तन्ख़्वाह असल से कम बताई थी ताकि कुछ पैसे जमा कर सकूं और उसे शराब में पैसे उड़ाने से रोक सकूं.
मालूम था कि पकड़ी गई तो कितनी मार पड़ेगी. आंख सूज जाएगी, आंतों में दर्द रहेगा, कमर पर कुछ निशान होंगे. पर सुकून था कि बैंक की फ़िक्स्ड डिपॉज़िट में जमा किए पैसे वो फिर भी नहीं निकाल पाएगा.
ऐसा मैडम ने समझाया था. वर्ना बैंक में खाता खोलना और पैसे जमा करना मेरे जैसी गांव में पली-बढ़ी लड़की के बस की बात कहां.
पर अब तो ज़िंदगी भी मौत सी लगने लगी थी. मैं थी 22 साल की पर 40 की लगने लगी थी.
बदन पतला ज़रूर था पर जवान नहीं. हड्डियों का ढांचा-सा रह गया था. आंखों के नीचे काले गड्ढे थे और चेहरे पर मासूमियत की जगह ऊबाई-सी थकान थी.
चलूं तो लगता था कि कमर भी हल्की-सी झुक गई है. और ये तो सिर्फ़ वो था जो सबको दिखाई देता था. जो कुछ अंदर बिखर गया था उसकी चीख तो सिर्फ़ मेरे कानों में ही गूंजती थी.
शुरुआत में तो मुझे कुछ ग़लत भी नहीं लगता था. 15 साल की उम्र में शादी हुई और ब्याह कर शहर आ गए. पति काम कर के घर आते तो खाने के बाद बिस्तर में मेरी ज़रूरत होती.
सिर्फ़ ज़रूरत. मैं बस एक शरीर थी जिसकी भावनाओं से उसका कोई सरोकार नहीं था.
आज भी जो करने जा रही थी उसके बारे में मैडम ने ही बताया था. पर दिल मुंह को आ रहा था. इस बार दांव पर मेरा शरीर था. और सुना था कि इस ऑपरेशन में मौत भी हो सकती है.
चौथी बार जब मैं पेट से थी तो 20 की हो गई थी. अधमरे से मेरे शरीर को जब मैडम (जिनके घर मैं काम करती थी) ने फिर फूलते देखा तो नाराज़ हो गईं.
पूछा, पैदा कर पाओगी? इतना ख़ून भी है शरीर में? मैंने कहा, हो जाएगा.
सोचा बड़े घर की ये औरत क्या समझेगी मेरी ज़िंदगी को. बेटा पैदा होने तक मुझे ये सब झेलना ही था.
बैंक में पैसे जमा करने की सलाह और मदद एक बात थी पर घर-परिवार की ये बारीक़ी नहीं समझा सकती थी उन्हें.
मन करता था कि सब चुपचाप हो जाए. किसी को पता ना चले कि मैं पेट से हूं, मेरा शरीर ना बदले, मेरी ज़िंदगी की कहानी भरे चौराहे पर ना ला दे.
मुझे यक़ीन था कि बेटा हो जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा. मारपीट, शराब, बिस्तर का वो मनहूस सिलसिला टूट जाएगा. और इस बार बेटा ही हुआ!
'लेकिन रुकी नहीं थी यातना'
अस्पताल में जब नर्स ने आकर ये बताया तो मैं रोने लगी. बच्चा पैदा करने के लिए 10 घंटे से सहा दर्द और नौ महीने तक कमज़ोर शरीर में पालने की थकान मानो एक पल में ग़ायब हो गई. पर फिर... फिर कुछ नहीं बदला. वो मनहूस सिलसिला जारी रहा.अब मेरी क्या ग़लती थी? अब तो मैंने बेटा भी पैदा कर दिया था. पर मेरे पति को शायद शैतान बनने की आदत पड़ गई थी.
मेरा शरीर बहुत टूट गया था. फिर से पेट से ना हो जाऊं, ये ख़ौफ़ हर व़क्त सताता रहता था.
'मैंने कुंवारी मां बनने का फ़ैसला क्यों किया?'
'हां, मैं ग़ैर-मर्दों के साथ चैट करती हूं, तो?'
एक दिन मेरी मैडम ने मेरा बेजान चेहरा देख मुझसे पूछा, एक चीज़ बदलनी हो तो क्या बदलोगी अपनी ज़िंदगी में. मैं हंस दी. अपनी चाहत के बारे में ना मैंने कभी सोचा था ना किसी ने कभी पूछा था.
पर बात हंसी में टाली नहीं. ख़ूब सोचा. एक हफ़्ते बाद मैडम से कहा कि मेरा जवाब तैयार है. वो तो तब तक भूल भी गई थीं शायद.
#HerChoice 12 भारतीय महिलाओं के वास्तविक जीवन की कहानियों पर आधारित बीबीसी की विशेष सिरीज़ है. ये कहानियां 'आधुनिक भारतीय महिला' के विचार और उसके सामने मौजूद विकल्प, उसकी आकांक्षाओं, उसकी प्राथमिकताओं और उस
मैंने कहा कि मैं फिर मां नहीं बनना चाहती, पर अपने पति को कैसे रोकूं ये नहीं जानती. मैंने समझाने की कोशिश की थी. चार बच्चों को खिलाने के लिए पैसे नहीं हैं, ये भी कहा था. पर बिस्तर उससे नहीं छूटता. मेरे कमज़ोर शरीर की परवाह नहीं. और बच्चों की ज़िम्मेदारी जब कभी ली ही नहीं तो उससे क्या डर.तब मैडम ने कहा, नसबंदी का ऑपरेशन करवा लो. ये तुम्हारे हाथ में है. तुम उसे रात में चाहे ना रोक पाओ, कम से कम गर्भवती होने से तो खुद को बचा लोगी.
मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता था. कई दिन बीत गए. मेरे बहुत से सवाल थे. जब मैडम जवाब देते-देते थक गईं तो एक क्लीनिक का पता दिया.
वहां मेरे जैसी और औरतें थीं. उन्हीं से पता चला कि नसबंदी का ऑपरेशन जल्दी से हो तो जाता है पर कुछ गड़बड़ हो जाए तो जान भी जा सकती है.
की इच्छाओं को पेश करती हैं.
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