कुछ साल पहले मैं दंतेवा
ड़ा के एक स्कूल में गई थी. स्कूल के प्रिंसिपल ने मुझे कथित माओवादियों का एक पत्र
दिखाया जिसमें लिखा गया था कि स्कूल बंद कर दो. इसके आख़िर में लाल स्याही
से लिखा गया था- 'लाल सलाम.'
जांच में पता चला कि छुट्टी न मिलने के
कारण प्रधानाचार्य से नाराज़ एक अध्यापक ने यह ख़त लिखा था. देश में इस तरह
से बहुत सारे 'माओवादी' पत्र घूम रहे हैं. कई बार वे माओवादियों द्वारा
दिए गए होते हैं तो कई बार पुलिस और आम लोग भी लिखते हैं ताकि निजी रंजिश
निपटाई जा सके.
जब कभी गांव वाले इस तरह की नक्सली चिट्ठियां लिखते
हैं तो वे लिखावट साफ़ रखने की कोशिश करते हैं क्योंकि उनकी नज़रों में
माओवादियों का जुड़ाव पढ़ने-लिखने से रहता है. मगर पुलिस जब ऐसी माओवादी
चिट्ठियां लिखती है तो वह उन्हें कुछ ज़्यादा ही अनपढ़ दिखाने की कोशिश
करती है.
पुणे पुलिस ने जो चिट्ठियां जारी की हैं. वे इस तरह के
फ़र्ज़ी माओवादी पत्रों के 'अर्बन पुलिस' संस्करण हैं जो उनकी 'अर्बन
नक्सलियों' की कल्पना के अनुरूप बैठ सकें. इन पत्रों का कोई मतलब नहीं है.
उदाहरण
के लिए एक पत्र को कथित तौर पर 'कॉमरेड सुधा' ने 'कॉमरेड प्रकाश' को लिखा
है, उसमें कई बार वह अपना नकली नाम लिखती हैं तो कई बार असली नाम (ख़ासकर
उन लोगों के, जिन्हें पुलिस गिरफ़्तार करना चाहती है).
इस कथित चिट्ठी में वह अलगाववादियों के
लिए उग्रवादी लिख रही हैं जिनके
साथ उनकी सहानुभूति बताई जाती है जबकि मानवाधिकार का उल्लंघन कर रहे
सुरक्षाबलों के लिए 'दुश्मन' शब्द इस्तेमाल कर रही हैं.
सुधा भारद्वाज को जो थोड़ा-बहुत भी जानता हो, वह इस बात पर यक़ीन नहीं करेगा कि वह ख़ुद के लिए या अपनी बेटी के लिए पैसे मांगेंगी. सुधा नेकि
पूरी तरह से वैध गतिविधियों, जैसे कि क़ानूनी सहायता देने, घटनाओं के पीछे
का सच तलाशने और बैठकों तक को आतंकवादी साज़िश रचने का नाम दे दिया जा रहा
है.
इन चिट्ठियों से इतर, ऐसा अचानक क्या हो गया कि पुलिस के
मुताबिक़ इतने सारे वरिष्ठ नागरिक चुपके से साज़िशें रचने लगे और हत्या के
प्रयास करने लगे. वह भी तब, जब वे ताउम्र सार्वजनिक रूप से लोकतात्रिक
राजनीति में रहे हों और ख़ासकर आपातकाल में भी.
गिरफ़्तार किए गए
लोगों में सबसे कम उम्र
महेश राऊत की है जो प्राइम मिनिस्टर रूरल
डिवेलपमेंट फैलो रह चुके हैं. दिसंबर 2017 में यलगार परिषद से कुछ दिन पहले
वह गढ़चिरौली में आदिवासी गांववालों की एक बड़ी बैठक के आयोजन की तैयारी
कर रहे थे ताकि वन अधिकार अधिनियम और पीईएसए (पंचायत एक्सटेंशन टू शिड्यूल
एरियाज एक्ट, 1996) पर चर्चा की जा सके.
मगर पुलिस के गोलमोल लॉजिक
के मुताबिक़, इन लोगों का ख़ुलापन और इनकी गतिविधियों का संविधान के
अनुरूप होना ही इन्हें 'शहरी नक्सली' बनाता है.
कहा जा रहा था कि
नोटबंदी ने माओवादियों और कश्मीरी अलगाववादियों की कमर तोड़ दी है. फिर वो
इतने मज़बूत कैसे हो गए कि प्रधानमंत्री को ही धमकी देने लगें?
गृह मंत्री कहते हैं
कि चूंकि ग्रामीण इलाक़ों में माओवादियों को हराया जा रहा है, वे शहरी इलाक़ों में फैल रहे हैं. मगर जो लोग शहरी नक्सली बताकर गिरफ़्तार किए जा रहे हैं, वे तो हमेशा से खुलेआम राजनीति में थे.
दिल्ली
हाई कोर्ट में गौतम नवलखा की रिमांड पर बहस के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल
अमन लेखी ने कहा कि पुलिस दावा करती है कि पहले उन्होंने पांच को
गिरफ़्तार किया और फिर पहले दौर की गिरफ़्तारी से मिले सबूतों आदि के आधार
पर पांच और को गिरफ़्तार किया. उनका कहना था कि इससे अभी और गिरफ़्तारियां
भी हो सकती हैं.
अगर इस पूरे मामले में बड़े पैमाने पर साज़िश
रची जा रही थी, वह साज़िश कार्यकर्ता नहीं बल्कि पुणे पुलिस और महाराष्ट्र व
केंद्र की बीजेपी सरकार रच रही थी. आइए इस साज़िश और इन गिरफ्तारियों के
पीछे के कारणों से पर्दा उठाएं. ये गिरफ़्तारियां अभी क्यों हुईं? इन्हीं
लोगों को क्यों गिरफ़्तार किया गया और इससे सरकार क्या हासिल करना चाहती
है?
इस कार्रवाई के पीछे का पहला कारण तो ज़ाहिर है सनातन संस्था की आतंकी गतिविधियों और गौरी लंकेश, एमएम कलबर्गी, गोविंद पानसरे और दाभोलकर की हत्याओं में कथित भूमिका से ध्यान बंटाना है.
मानवाधिकार
कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने के लिए जिस एफ़आईआर को आधार बनाया गया, वह
भीमा कोरेगांव की हिंसा में नामजद संभाजी भिडे और मिलिंद एकबोटे के अनुयायी
तुषार दमगुडे की शिकायत के आधार पर दर्ज की गई थी.
इसमें कोई हैरानी नहीं है कि इन दोनों के ख़िला
फ़ चल रही जांच कछुए की रफ़्तार से आगे बढ़ रही हैं. इसके साथ ही माया कोडनानी और 2002 के गुजरात नरसंहार में शामिल अन्य के बरी होने को भी इसी क्रम में देखा जाए. इशरत जहां और सोहराबद्दीन की हत्याओं में फंसे अमित शाह, वंजारा और अन्य से आरोप हटाए जाने को भी.
योगी आदित्यनाथ द्वारा अपने ऊपरे से मामले हटाने और जयंत सिंहा द्वारा झारखंड में लिंचिंग करने वालों को हार जैसे और भी कई मामले हैं.